शनिवार, 13 मई 2017

फिल्म विकास निगम को लेकर राजनीति शुरू

छालीवुड स्टारडम का सम्पादकीय 
छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम की घोषणा के 6 माह बाद भी जब कई पहल सरकार की ओर से नहीं हुई तब एक बार फिर छालीवुड के कलाकार मुखर हो गए हैं और फिर से संघर्ष करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही राजनीति भी शुरू हो गई है। यहां एक दो नहीं कई गुट है जो अपनी गोटी बैठाने की फिराक में है। मुख्यमंत्री को घोषणा से पहले शायद यह पता नहीं रहा होगा कि छालीवुड में इतनी मारामारी भी है। एक ओर संघर्ष के लिए बैठको का दौर शुरू हो गया है वही कुछ कलाकार इसे गलत कदम बता रहे हैं। एक कलाकार ने तो मुझे फोन करके यहां तक कह दिया कि सीएम पर यह गलत प्रहार है। एक बड़े कलाकार ने तो बाकायदा मुख्यमंत्री को पत्र लिखाकर फिल्म विकास निगम नहीं बनाने का अनुरोध तक किया है। छालीवुड में कई ऐसी भी हस्तियां है, जिन्होंने इस इंडस्ट्री को अपना सबकुछ दे दिया है। ऐसे लोग चुप बैठकर नजारा देख रहे है, पर दावेदारी नहीं जता रहे है। फिल्म विकास निगम के सही दावेदार यही लोग है, जैसे- श्री संतोष जैन, मोहन सुंदरानी, प्रेम चंद्राकर, सतीष जैन, अनुज शर्मा। निगम के लिए दावेदारी ऐसे लोग जता रहे है। जिन्होंने छालीवुड को कुछ भी नहीं दिया है। ऐसे लोगों की काबिलियत सबको पता है। फिल्मों में काम कर लेने से कोई योग्य नहीं हो जाता। सबसे मजेदार बात तो यह है कि निगम-मंडल का पद राजनीतिक होता है। सत्तारूढ़ दल के मुखिया पार्टी के निष्ठावान नेताओं को यह दायित्व सौंपता है। जो फिल्म विकास निगम मेें भी यही होगा। निगम की अभी सिर्फ घोषणा हुई है, गठन नहीं। इसके अस्तित्व में आते-आते चुनावी वर्ष आ जाएगा और चुनावी वर्ष में निगम-मंडल भंग कर दिए जाते है। खैर जो भी हो सरकार की ओर से पहल सकारात्मक है। इसे छालीवुड के लोग उत्साह से स्वीकारें। ताजुब तो तब हुआ जब एक ऐसे कलाकार ने सोशल मीडिया के जरिए निगम अध्यक्ष के लिए दावेदारी जता दी, जो काबिल तो कहीं से भी नहीं है। हां, पूरे समय विवादों में जरूर रहा है। योग्य लोग खामोश है। सीएम की इस घोषणा से ये जरूर साफ हो गया कि कौन लालची है ओर कौन सही में योग्य है।
छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम आखिर कब तक बनेगी, यह प्रश्न सभी कलाकारों के मन में है क्योकिं संस्कृति विभाग में निगम का तो बोर्ड लगा दिया गया है पर बजट में इसका कोई प्रावधान नहीं किया गया है। सरकार वर्षों से सिर्फ कलाकारों को दिलासा देती आ रही है। निगम का मसौदा कई साल पहले ही वरिष्ठ आईपीएस श्री राजीव श्रीवास्तव ने तैयार कर सरकार को दे दिया था, लेकिन आज तक वह आगे नहीं बढ़ पाया। सचिव संस्कृति विभाग आरसी सिन्हा  दिनों पहले ही कहा था कि छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम के गठन की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है। अन्य राज्य के फिल्म विकास निगम के नियमों का अध्ययन किया जा रहा है। इनमें से जो बेहतर और छत्तीसगढ़ के लिए उपयोगी हैं, उन्हें इसमें शामिल किया जाएगा। चलो मान लेते है कि निगम बनाने की दिशा में सरकार ने कदम बढ़ा दी है, पर जब सरकार ने बजट ही नहीं दिया है तो आगे काम कैसे होगा। छत्तीसगढ़ के कलाकार लंबे अरसे से फिल्म विकास निगम के गठन की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कई बार धरना-प्रदर्शन तक किया। 18 सितंबर 2013 धरना-प्रदर्शन कर कलाकारों ने मुख्यमंत्री को इस संबंध में ज्ञापन भी सौंपा था। यही नहीं, विधानसभा चुनाव में राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में भी फिल्म विकास निगम के गठन की घोषणा की थी।पर लगता है यह टाँय टाँय फिस्स ही होगा। 

दीवाना छत्तीसगढिय़ा में दिखा भारती धुरी का जलवा


छालीवुड में सिंगर से फिल्मो में कदम रखने वाली भारती धुरी की तमन्ना एक अच्छी अदाकारा बनने की है। वे छालीवुड में सभी प्रकार की भूमिका निभाना चाहती है ताकि उन्हें हर प्रकार अनुभव हो जाए। वे कहती है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मो में गुणवत्ता हो तो जरूर थियेटरों में चलेगी। भारती कहती है कि सरकार छालीवुड की मदद करे। टाकीज बनवाए, नियम बनाये। छत्तीसगढ़ी फिल्मो को सब्सिडी दें ताकि कलाकारों को भी अच्छी मेहनताना मिल सके।अभी हाल ही में प्रदर्शित फिल्म दीवाना छत्तीसगढिय़ा में भारती धुरी का जलवा देखने को मिल रहा है। भारती जितनी अच्छी कलाकार है उतनी ही सुन्दर भी है।  बिलासपुर की रहने वाली भारती धुरी कहती है कि मुझे एक्टिंग का शौक बचपन से ही रहा है। गाने गाते गाते एक्टिंग करने लगी। पहले एल्बम की फिर मुझे असली संगवारी में काम करने का मौका मिला और आज आपके सामने हूँ। वे कहती है कि आने वाले समय में यहां की फिल्मे बॉलीवुड की तरह ही चलेंगी।यहां फिलहाल दर्शकों की कमी है। लोगो में अपनी भाषा के प्रति वो रूचि नहीं है जो होनी चाहिए । थियेटरों  की कमी को सरकार पूरा करे। उनका कहना है कि यहां की फिल्मो में बहुत सारी कमियां होती है। फिल्मो में वो गुणवत्ता नहीं होती जो यहां के लोगो को चाहिए। प्रोड्यूसरों को इस और ध्यान देने की जरुरत है। भारती धुरी कहती है कि मैं हर तरह की भूमिका निभाना चाहूंगी। क्योकिं छालीवुड में कुछ करके दिखाना चाहती हूँ। लोग मुझे एक अच्छी अभिनेत्री के रूप में जाने पहचाने बस यही तमन्ना है। भारती को अपने परिवार से वि सहयोग नहीं मिला है जो एक लडक़ी को मिलना चाहिए। अब कला ही उनकी जिंदगी है और जीवन यापन का साधन भी। उनके पति भी एक अच्छे कलाकार हैं। 

नैनी की मोंगरा में शानदार एंट्री

कवियित्री से फिल्मों का सफर  
किसी एक इंसान में बहुत सारे गुण हो ऐसे बिरले लोग ही मिलते हैं। जी हाँ यही गुण है नंदिनी तिवारी नैनी में। वे एक शिक्षिका होने के साथ साथ कवयित्री, लेखिका, एक्ट्रेस, एंकर और डांस कोरियोग्राफर भी है। नैनी की तमन्ना फिल्मो में धूम मचाने की है। उनकी फिल्म मोंगरा में धमाकेदार एंट्री हुई है। ईएसके पहले नैनी एजाज वारसी की ड्रीम प्रोजेक्ट अंधियार में भूमिका निभा चुकी है। अब वे फिल्मों में किस्मत आजमा रही है। मुंगेली की रहने वाली नैनी अभी केन्द्रीय विद्यालय नवरंगपुर ओडिशा में शिक्षिका के पद पर कार्यरत है। नंदिनी तिवारी नैनी  का मेरा जन्म एक साहित्यकार परिवार में हुआ। जो लेखन के लिए प्रेरक रही एवं आसपास के कुदरती वातावरण उनके भीतर कविता का सृजन करते हैं ।वे कहती है कि पारिवारिक माहौल के साथ मेरी भावनाओं ने मेरी गीत-गज़़लों को अल्फ़ाज़ दिए। अब फिल्मो में कूद पडी है। उनकी दिली तमन्ना छालीवुड फिल्मो में काम करते रहने की है।
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संक्षिप्त परिचय 





नाम   - नंदिनी तिवारी नैनी
शिक्षा    एम•ए(हिन्दी), बी•एड•,पीएचडी(हिंदी)
व्यवसाय   - शिक्षिका, कवयित्री, लेखिका, ऐक्ट्रेस, एंकर
रुचि  - सिंगिंग, डांसिंग, रीडिंग लिट्रेचर बुक
उपलब्धि  -  सद्भावना साहित्य संस्थान द्वारा सम्मानित
                     डायट ओडिशा द्वारा सम्मानित
हिंदी विषय पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय सेमीनार में व्याख्यान ।
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बेटियों को लेकर बेहतरीन सन्देश है मोगरा
लेखक निर्देशक निर्माता सोहन लाल वर्मा की फिल्म मोगरा देश के प्रमुख 10 भाषाओं में एक साथ रिलीज होगी। यह फिल्म अभी छत्तीसगढ़ी भाषा में शूट की गयी है। फिल्म की कहानी नारी प्रधान है जिसमे बेटी बचाने का बेहतरीन सन्देश दिया जा रहा है। निर्माता के सोच को सलाम किया जा सकता है। निर्माता सोहन लाल वर्मा ने बताया कि फि़ल्म मोंगरा की लगभग पूरी शूटिंग हो गयी है। इस फि़ल्म में एजाज वारसी सउदी अरब के मुश्लिम की भूमिका में रहेंगे। फि़ल्म के गाने बेहद कर्ण प्रिय बनाये गए है।जिसे सन्तोष यादव ने संगीतबद्द किया जो पांच साल मुंबई में रह चुके है आज देशभर में उनका हिंदी आर्केस्ट्रा चलता है।गायिका छाया प्रकाश जैन जाना पहचाना नाम है। वही नेहा तिवारी ने आइटम सांग गाया । पवन शर्मा ने साई भजन गीत गाया इस फि़ल्म में आठ अलग अलग प्रकार के गाने है जिसे बाजारवाद को ध्यान में रखकर बनाया गया है ,जिसे देश के प्रमुख 10 भाषओं में एक साथ रिलीज करेंगे।फि़ल्म को राष्ट्रिय लेबल के मार्केट  को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है जिसका विजुवल इफेक्ट देखते बनता है खासकर फाइट शीन में आपको दक्षिण भारतीय तडक़ा नजर आयेगा। फि़ल्म के हीरो दीपक सोनी, हीरोइन अंजना दास , माँ की भूमिका में है श्वेता शर्मा ,खलनायक एजाज वारसी व् विजय भैमिक पवन शर्मा । लेखक निर्देशक निर्माता सोहन लाल वर्मा, मोंगरा फि़ल्म का अगला शेड्यूल 25 मई से लगाने की तैयारी है। 

नए रूप में दिखाई दे रहे हैं राजेश पण्डया

काम करता हूं ,फल की चिंता नहीं करता
छालीवुड अभिनेता राजेश पण्डया आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है. लेकिन इन दिनों वे नए रूप में दिखाई दे रहे हैं । उन्हें कैमरे के साथ खेलते  सकता है। उनके एल्बम छत्तीसगढ़ के गांव गांव और हर घरों में देखे सुने जाते हैं। सहज सरल राजेश की दिली तमन्ना है की लोग उन्हें एक अच्छे कलाकार के रूप में ही जाने पहचाने7 कई फिल्मों व एल्बमों में अपनी कला का जादू बिखेर चुके राजेश का कहना कि एक कलाकार कभी भी अपने कामो से संतुष्ट नहीं हो सकता। मुझे अभी बहुत कुछ करना है बहुत कुछ सीखना है। मै काम करता हूं ,फल की चिंता नहीं करता7 वे कहतें हैं कि छत्तीसगढ़ फिल्मों को थियेटरों की कमी से जूझना पड़ रहा है अगर सरकार सहूलियत दे और कारपोरेट सेक्टर प्रदेश में सौ-डेढ़ सौ नए सिनेमाघर बना दे तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों का रंग ही बदल जायेगा।
वे कहते हैं की छतीसगढ़ी फिल्में इस कारण थियेटर में ज्यादा नहीं चल पाती क्योंकि आज के बच्चे बॉलिवुड फिल्म को ज्यादा महत्व देते हैं। दूसरी तरफ जो गाँव के लोग है वो छतीसगढ़ी फिल्म को बड़े ही चाव से देखते है और महत्व भी देते है। लेकिन हम उन तक नहीं पंहुच पाते। राजेश का कहना है कि मैंने पूरी ईमानदारी से अपने किरदार के साथ न्याय किया है। जब मै भूमिका में होता हूं तो अपने किरदार में पूरी तरह से डूब जाता हूं । बचपन से ही उन्हें एक्टिंग का शौक रहा है। स्कूल कालेज के समय से ही ड्रामा और डांस करते आ रहा है फिर एल्बम करने लगा. जिसमे उसे लोगो ने बहुत सराहा वही उनका सबसे बड़ा तोहफा भी है। एलबम का उन्हें सुपरस्टार भी कहा जा सकता है। राजेश का कहना है की वे कभी निराश नहीं होते और ना कभी निराशा मिली है।एक कलाकार कभी भी अपने कामो से संतुष्ट नहीं हो सकता। मुझे अभी बहुत कुछ करना है बहुत कुछ सीखना है।छत्तीसगढ़ी सिनेमा में शौकिया तौर पर फिल्म बनाने वाले लोग बड़ी संख्या में आ रहे है। कई भाषाओं में क्षेत्रीय फिल्म निर्माण से छत्तीसगढ़ी फिल्मों की आउट सोर्सिंग हुई है भोजपुरी, और उडिय़ा से नया बाजार मिला है इसी तरह और भी तरीके ईजाद करने से इंडस्ट्रीज के
सभी लोगों का भला होगा। यहां कलाकारों की कतई कमी नहीं है।
छत्तीसगढ़ फिल्मों को थियेटरों की कमी से जूझना पड़ रहा है अगर सरकार सहूलियत दे और कारपोरेट सेक्टर प्रदेश में सौ-डेढ़ सौ नए सिनेमाघर बना दे तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों का रंग ही बदल जायेगा। उद्योगों की तरह रियायती दर में जमीन और उस पर कामर्शियल काम्प्लेक्स के निर्माण की अनुमति से नहीं कंपनियां सिनेमाघरों के निर्माण के लिए आकर्षित हो सकती है। राजेश की तमन्ना छालीवुड की फिल्मों में छा जाना की है।  उनका  सपना छालीवुड की सबसे अच्छे स्टार बनने की ही है।लोग मुझे छालीवुड स्टार के नाम से ही जाने।वे कहते है की हर प्रकार की भूमिका पसंद है। अब तक सभी रोल कर चुका हूँ , नायक ,खलनायक सह अभिनेता की भूमिका सब कुछ कर चुका हूँ।

उभरती अदाकारा अंजना दास

बिन बिहाव गवना में दोहरी भूमिका में दिखेंगी 
छॉलीवुड की उभरती अदाकारा अंजना दास होम प्रोडक्शन की फिल्म बिन बिहाव गवना में दोहरी भूमिका में नजर आएंगी । यह फिल्म अगले महीने फरवरी में रिलीज होने जा रही है। इस फिल्म की डायरेक्टर उनकी मम्मी ही है। अंजना कहती है की यह फिल्म बहुत ही अच्छी बनी है और मुझे इस फिल्म से बहुत ज्यादा उम्मीदें है। यह दो बहनों की कहानी है और दोनों बहनों की भूमिका में अंजना दास ही नजर आएंगी। अंजना ने इस फिल्म के लिए बहित ही मेहनत की है। उनके मम्मी पापा ने बेटी को लेकर बिन बिहाव गौना बनाई है जो एक पारिवारिक फिल्म है जिसमे अंजना की भूमिका भी प्रभावशाली है।


अंजना की एक ही तमन्ना है कि वे फिल्मों में अपनी अदाकारी से नाम कमाकर अपनी माता पिता का सपना पूरी कर सके. उनमे खूबियों का खजाना है। वे एक अच्छी कलाकार है ।  उन्हें अपने काम के प्रति जूनून है। उनका कहना है कि वे छालीवुड की फिल्मों में छा जाना चाहती हैं । उनका सपना छालीवुड के साथ बंगाली फिल्मों की स्टार बनने की है।  छत्तीसगढ़ी फिल्मों के साथ साथ अंजना अभी हिन्दी और भोजपुरी फिल्मों में भी अपनी कला का लोहा मनवा रही हैं। उन्होंने पांच फिल्में और 150 से ज्यादा एल्बम किया है।
अंजना को एक्टिंग का शौक नहीं था, पर मम्मी डॉ काजुल् दास की जिद्द और मेहनत ने उसे छालीवुड की एक अच्छी अदाकारा बना दी है7 मम्मी -पापा ही अंजना के लिए सब कुछ है यही कारण है कि अब अंजना के लिए एक्टिंग शौक नहीं , पागलपन बन गया है। वे कहती है कि़ शौक तो ख़त्म हो जाता है पर पागंलपन हमेशा बना रहता है। ये मेरा जूनून है जो कभी ख़त्म नहीं होगा। अब यही उनका करियर है।
अंजना छालीवुड की फिल्मों के साथ साथ बंगाली फिल्मों में भी छा जाना चाहती है। उनका सपना बंगाली की  सुपरस्टार बनने ने की ही है। लोग मुझे बंगाली फिल्मों कीश्रेष्ठ स्टार के रूप में जाने यही उनकी ख्वाहिश है7 अंजना की अभी दो फिल्में बंध गईल पिरितिया के डोर (भोजपुरी) और मोगरा (छत्तीसगढ़ी) निर्माणाधीन है7 अंजना की फिल्मों में एंट्री भी दिलचस्प है7 मनोजदीप के एक एल्बम में उनकी एक्टिंग से प्रभावित होकर फिल्म असली संगवारी के डायरेक्टर ने उन्हें अपने फिल्म में ले लिया7 अंजना की माने तो यहां फिल्मे कमजोर बन रही है और  की नकल होती है। फिल्मे नहीं चल पाती इसकी वजह भी हैं और वो सब जानते हैं कि पिछड़े हुए राज्य में टॉकीजों का विकास नहीं होना। छत्तीसगढ़ में मिनी सिनेमाघर दो सौ दर्शकों की क्षमता वाली टॉकिजों की बड़ी आवश्यकता है जहां छत्तीगसढ़ी फिल्मों के दर्शक आसानी से पहुंच सके। पात्र के हिसाब से कलाकारों का चयन नहीं होता। कुछ लोग इस इंडस्ट्री को खराब कर रहे हैं , वे ऐसे लोग है जो काम लागत में कुछ भी फिल्में बना लेते हैं। 

कब आएंगे अच्छे दिन

अरुण कुमार बंछोर 
छत्तीसगढ़ी भाषा की फि़ल्मों को इस साल 52  बरस होने जा रहा हैं, लेकिन आधी सदी पुराना छत्तीसगढ़ का फि़ल्म उद्योग अब भी पहचान के के लिए तरस  रहा है.। नया राज्य बनने के बाद से 198 फि़ल्में छत्तीसगढ़ी भाषा में बनी हैं.यह और बात है कि दजऱ्न भर फि़ल्मों को छोड़ अधिकांश फिल्में अपनी लागत भी नहीं निकाल पाई है। पहली छत्तीसगढ़ी फि़ल्म 1965 में बनी थी-‘कही देबे संदेश’. इस फि़ल्म के गाने बेहद लोकप्रिय हुए थे, जिन्हें मोहम्मद रफ़ी, महेंद्र कपूर और मन्ना डे जैसे गायकों ने आवाज़ दी थी.लेकिन, फि़ल्म प्रदर्शन से पहले ही जात-पात की राजनीति करने वालों के निशाने पर आ गई और रायपुर के बजाए फि़ल्म का प्रदर्शन दुर्ग के तरुण टॉकीज़ में करना पड़ा था। बाद में फि़ल्म को सहकारिता को प्रोत्साहित करने वाली बताकर मनोरंजन कर में छूट भी दी गई.
इसके बाद निर्माता विजय कुमार पांडेय ने 1971 में ‘घर द्वार’ नाम से फि़ल्म बनाई. फि़ल्म के निर्देशक थे निर्जन तिवारी. फि़ल्म तत्कालीन मध्यप्रदेश के अलावा पड़ोसी राज्यों में भी रिलीज़ की गई. फि़ल्म के बारे में दावा किया जाता है कि यह फि़ल्म अच्छी चली. लेकिन ‘कही देबे संदेश’ और ‘घर द्वार’ के ‘चलने’ में मुनाफ़ा शामिल नहीं था, यही कारण है कि लगभग 30 साल तक किसी ने फिर छत्तीसगढ़ी फि़ल्म बनाने के बारे में सोचा भी नहीं.तीसरी छत्तीसगढ़ी फि़ल्म कोई तीस साल बाद वर्ष 2000 में ‘मोर छंइहा भुंइया’ नाम से बनी. छत्तीसगढ़ राज्य बनने वाला था और भाषाई प्रेम ज़ोर पर था. छत्तीसगढिय़ा अस्मिता की ताल ठोंकने वाले समय में परदे पर आई सतीश जैन की इस फि़ल्म ने इतिहास रचा. नया राज्य बनने से ठीक पहले आई इस फि़ल्म को देखने के लिए लोग सिनेमाघरों में टूट पड़े. यह सिलसिला अगले 2-3 बरसों तक बना रहा.इसके बाद छत्तीसगढ़ी में फि़ल्म बनाने का सिलसिला तो जारी रहा, लेकिन फि़ल्मों की सफलता का नहीं.‘मया देदे मया लेले’, ‘झन भूलो मां बाप ला’ और ‘मया’ जैसी कुछ फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो इस पूरे दौर में छत्तीसगढ़ी फि़ल्में बनती रहीं और मुंह के बल गिरती रहीं।
छॉलीवुड के नाम से पुकारे जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा की फि़ल्मों के सबसे लोकप्रिय हीरो अनुज शर्मा की राय है कि छत्तीसगढ़ी की फि़ल्मों का अपना कोई स्वतंत्र बाज़ार नहीं है और इन्हें हिंदी फि़ल्मों से मुक़ाबला करना होता है. अनुज कहते हैं, मोर छइहा भुइंया फि़ल्म मोहब्बतें और मिशन कश्मीर जैसी फि़ल्मों के साथ रिलीज हुई थी. लगभग 20 लाख रुपये की लागत से बनी इस फि़ल्म ने इतिहास रचा था. हमारी फि़ल्मों का बजट तो हिंदी सिनेमा के जूते-चप्पल के बजट के बराबर होता है. फिर भी हम बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में कॉमेडी फि़ल्में भी बन रही हैं और हॉरर भी, यहां तक कि वयस्क फि़ल्में भी. डबल रोल वाली फि़ल्में और थ्रीडी फि़ल्में तो हैं ही.हालांकि, अधिकांश फि़ल्मों की कहानी गांव केंद्रित होती है और अधिक हुआ तो गांव से शहर आए नायक की कहानी फि़ल्मों का आधार होती है.यही कारण है कि कई निर्माता-निर्देशक तो अपनी फि़ल्मों की शूटिंग अपने आसपास के गांव में ही करते हैं।
कभी-कभार आप रायपुर शहर के किसी चौक-चौराहे पर फि़ल्म की शूटिंग देख सकते हैं, लेकिन निर्माता-निर्देशक पड़ोसी राज्य ओडिशा को शूटिंग और संपादन के लिहाज से बेहतर मानते हैं। इसी तरह, अधिकांश फि़ल्मकारों की कोशिश होती है कि गीतकार-संगीतकार स्थानीय हों, लेकिन गायक या गायिका कोई बॉलीवुड से जुड़ा नाम हो. लेकिन इन फि़ल्मी गानों में भाषा भर छत्तीसगढिय़ा होती है, संगीत और ताम-झाम मुंबइया फि़ल्मों जैसा ही होता है.फि़ल्मों का बजट 15-20 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ तक होता है और फि़ल्म में कलाकारों को अधिकतम 3 से 5 लाख रुपये मिलते हैं.फि़ल्म में स्थानीय कलाकार ही मुख्य भूमिका निभाते हैं, लेकिन हीरोइनों के लिए छत्तीसगढिय़ा फि़ल्मकारों को कई बार भोजपुरी, उडिय़ा या मुंबई की कम बजट वाली हीरोइनों का मुंह देखना पड़ता है.छत्तीसगढ़ी फिल्मों में मुंबइया लटके-झटके और नकल के रास्ते सफलता तलाशने की भी लगातार कोशिश हो रही है.कई बार तो हिंदी समेत दूसरी भाषा की फि़ल्मों को सीधे-सीधे छत्तीसगढ़ी में डब किया जा रहा है या उनकी हास्यास्पद कि़स्म की रीमेक बन रही हैं.दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ी में डब की जाने वाली फि़ल्मों में मिथुन चक्रवर्ती की फि़ल्में पहले नंबर पर हैं.छत्तीसगढ़ में रहते हुए सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम की लिखी ‘गांजे की कली’ कहानी पर योगेंद्र चौबे ने कलात्मक फि़ल्म बनाई, जिसकी दुनिया भर में प्रशंसा हुई.इस फि़ल्म के निर्माता अशोक चंद्राकर कहते हैं, हमने मान लिया है कि छत्तीसगढ़ी फि़ल्म का मतलब है ऐसी फि़ल्म, जिसकी भाषा छत्तीसगढ़ी हो और वह लो बजट वाली हो. छत्तीसगढ़ी की फि़ल्म में यहां लाइफ स्टाइल, संस्कृति होनी चाहिए. जो आमतौर पर यहां की फि़ल्मों में दिखाई नहीं देती. बस्तर के इलाके में अविनाश प्रसाद जैसे लोगों ने हल्बी भाषा में ‘मोचो मया’ जैसी फि़ल्में बनाईं और नाम भी कमाया. ज़ाहिर है, हल्बी की फि़ल्म थी, इसलिए दर्शक भी केवल बस्तर के ही मिले. लेकिन अविनाश इससे निराश नहीं हैं। 

एक अच्छी खलनायिका बनना चाहती है संजू

हर काम पसंद है सिर्फ कहना बनाना नहीं
छालीवुड में हर प्रकार की भूमिका निभा चुकी संजू साहू की दिली तमन्ना एक अच्छी खलनायिका बनने की है। छोटी सी उम्र में कला के प्रति समर्पित संजू ने कम उम्र में ही फिल्म मोर छईयां - भूइयां में अनुज शर्मा की माँ का रोल कर अपने अभिनय से सबको चौका दिया था। तब से लेकर अब तक उन्होंने पीछे मुडकऱ नहीं देखा। आज वे एक कामयाब अभिनेत्री है। वे कहती है कि अभी तो छालीवुड में बहुत कुछ करना है ,अब तक जो किया है वह काम है। संजू एक गृहणी भी है उन्हें घर का हर काम पसंद है पर खाना बनाना नहीं। सन 2005 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुनी गयी थी। छोटी बड़ी सौ फिल्में, 300 से अधिक एल्बम और 450 से अधिक स्टेज शो कर चुकी है।
संजू को मुझे एक्टिंग का शौक बचपन से ही रहा है। स्कूल में नाटकों में भाग लिया करती थी। जब जब मैं  देखती थी तब तब मुझे लगता था कि मुझे भी ऐसे ही कुछ बनना चाहिए । फिर बड़े बड़े लोकगायकों के साथ स्टेज शो करने लगी थी। शुरू से ही मेरा रुझान इसी ओर था। मेरे मन में बहुत कुछ कर गुजरने की इच्छा थीजिसे लेकर मैं आगे बड़ी और आज मै इस मुकाम पर हूँ। उनकी पहली फिल्म मोर छईयां - भूइयां है वे कहती है की उसमे मुझे बहुत ही काम उम्र में माँ का रोल दिया गया और जब मैंने अपने किरदार के साथ न्याय किया तो सब देखते ही रह गए। फिर मैंने पीछे पलटकर नहीं देखा। फिल्म दाई में मैंने मुख्य किरदार में थी तब लोगो को मेरा अभिनय इतना पसंद आया कि मुझे लेडी अमिताभ का खिताब दिया गया जो मेरे लिए सबसे बड़ा अवार्ड है। उसके बाद तो मुझे कई अवार्ड मिले।
संजू की नजर में छालीवुड की सम्भावनाये बेहतर है। आने वाले समय में यहां की फिल्मे बॉलीवुड की तरह ही चलेंगी।यहां फिलहाल दर्शकों की कमी है। लोगो में अपनी भाषा के प्रति वो रूचि नहीं है जो होनी चाहिए । थियेटरों  की कमी को सरकार पूरा करे। क्योकि यहां की फिल्मो में बहुत सारी कमियां होती है। फिल्मो में वो गुणवत्ता नहीं होती जो यहां के लोगो को चाहिए। कहानी प्रधान फिल्में नहीं बनती, मिट्टी से जुड़ाव होना चाहिए , फूहड़ कॉमेडी नहीं होना चाहिए, अगर अच्छी फिल्में बने तो लोग जरूर देखेंगे। संजू बताती है कि मेरा कोई रोल मॉडल नहीं है। नाटकों में भाग लेने के बाद लोगो ने मेरा अभिनय देखा और फिल्मो में मौका दिया। फिल्म अभिनेत्री श्रीदेवी को मैं सबसे ज्यादा पसंद करती हूँ। हेमामालिनी, रेखा, अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना मेरे आदर्श हैं। प्रेम की जीत को वे अपनी सबसे अच्छी फिल्म मानती है! उनका कहना है कि शुरू से ही मै एक्टिंग को कॅरियर बनाने की सोचकर चली हूँ। अब इसी लाईन पर काम करती  रहूंगी। मैं हर तरह की भूमिका निभाना चाहूंगी  , लेकिन निगेटिव रोल पसंद है। सरकार छालीवुड की मदद करे। टाकीज बनवाए, नियम बनाये। छत्तीसगढ़ी फिल्मो को सब्सिडी दें ताकि कलाकारों को भी अच्छी मेहनताना मिल सके। संजू की तमन्ना है कि छालीवुड में कुछ करके दिखाना चाहती हूँ। एक अच्छी खलनायिका बनने की तमन्ना है।
अब गायन में दे रही है ध्यान
छालीवुड की जानी मानी अभिनेत्री संजू साहू जितनी सुन्दर है उतनी ही अच्छी अदाकारा भी है। संजू को खूबियों का खजाना कहे तो कोइ अतिशियोक्ति नहीं होगी। परेम की जीत में दोहरी भूमिका निभाकर छालीवुड को एक नई दिशा भी उन्होंने ही दी है। एक्टिंग में माहिर संजू का इन दिनों एक नया रूप भी सामने आया है। वे इन दिनों गायन में ज्यादा ध्यान दे रही है। उनकी अपनी संस्था है संजू साहू स्टार नाईट जिसकी कमान जाने माने अभिनेता डॉ अजय सहाय के हाथों में है। वे एक मात्रा ऐसी अभिनेत्री है जिन्होंने फिल्म दाई में अपने बच्चे को बचाने के लिए सच में शेर से भीड़ गयी थी। ऐसा आज तक छत्तीसगढ़ी फिल्मो में नहीं हुई है। बॉलीवुड में जरूर देखने को मिलता है। भले ही शेर पालतू हो लेकिन उसके सामने जाने में अच्छों अच्छों की साँसे रूक जाती है। यह बात मुझे अभी हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान पता चला तो अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी। अच्छा इसलिए की हमारे छालीवुड में ऐसे साहसी कलाकार भी है जो अपने किरदार को जीवंत बनाने के किये कोइ कसर नहीं छोड़ते। संजू सच्चाई पसंद अभिनेत्री है।उन्होंने फिल्म छइयां भुईयां में बहुत ही कम उम्र में माँ की अच्छी भूमिका निभाकर सबको आश्चर्य में डाल दिया था। यहीं से उनकी पहचान फिल्मों में बनी थी और उन्हें ब्रेक मिला प्रेम की जीत से। संजू अब संगीत के हर अंदाज़ को जीना चाहती है और कुछ नया करना चाहती है। गाना सुन-सुनकर संगीत को महसूस करना सीखा है.