शनिवार, 23 अप्रैल 2016

छालीवुड को मिला नया खलनायक

मनोजदीप ने भरा खालीपन
छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री यानी छालीवुड को एक नया खलनायक मिल गया है। कोरियोग्राफर निर्देशक मनोजदीप एक बेहतर खलनायक बनकर उभरें हैं। या हम यह कह सकते हैं की मनोजदीप ने कुछ सालों से छालीवुड में हो रही खलनायक की कमी पूरी कर दी है।डांसिंग से करियर शुरू करने वाले  बहुत ही कम समय में ऊंची छलांग लगाई है। न केवल वे छालीवुड के सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफर है बल्कि एक अच्छे अभिनेता और निर्देशक भी है। छालीवुड स्टारडम सिने अवार्ड में उन्हें माटी मोर मितान के लिए सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफर का अवार्ड मिला हैं।
छालीवुड के सर्वश्रेष्ठ खलनायक माने अजाने वाले गिरधारी पांडे यानि मनमोहन ठाकुर के हीरो बन जाने के बाद इंडस्ट्री को एक अच्छे खलनायक की जरुरत महसूस हो रही थी। हालांकि खलनायकों की इंडस्ट्री में लम्बी कतारें है पर श्रेष्ठ खलनायक डॉ अजय सहाय के बाद मनोजदीप एक अच्छे खलनायक के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। मनोजदीप ने बाप बड़े ना भैया सेबल बड़े रुपैया,. माटी मोर मितान , एक अउ अर्जुन , किरिया ,तहलका हमार नांव , मया दे दे मयारू , मया 2 जैसी फिल्मों में खलनायकी का जादू दिखा चुके हैं। मनोजदीप तोर मोर यारी फिल्म में मुख्य खलनायक की भूमिका निभा रहे हैं। इस फिल्म में वे कोरियोग्राफर भी है। निर्माता अजय त्रिपाठी और निर्देशक प्रिंस विकास है।

रायपुर का पूरन किरी बना बॉलीवुड का हीरो

 फिल्म द बेटर हाफ में मुख्य भूमिका में है
कई धारावाहिकों में दिखा चुके है अपने अभिनय का जादू
कांकेर से आने जाने वाली बसों में कंडक्टर के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले पूरण किरी आज बॉलीवुड में अपने अभिनय से लोगो का दिल जीत रहे हैं । बहुत जल्द हिन्दी फिल्म द बेटर हॉफ में बतौर हीरो नजऱ आने वाले हैं। पूरन छोटे पर्दे के कई सीरियल्स में दमदार भूमिका निभा चुके हैं, हाल ही में उन्होंने स्टार प्लस के धारावाहिक ये रिश्ता क्या कहलाता है में देवयानी के पहले पति सुरेश के किरदार में दिख चुके हैं। इसके अलावा वे सावधान इंडिया और दिया और बाती हम जैसे धारावाहिकों में नजऱ आते रहे हैं। फिल्म के निर्देशक मंजूल कपूर का कहना है कि पूर्ण किरी में अभिनय कूट कूट कर भरा हुआ है आगे चलकर वे एक कामयाब नायक साबित होंगे।
पूर्ण किरी इन दिनों तीन हिन्दी फिल्मों में हीरो बनकर आ रहे हैं । फिल्म द बेटर हाफ में उनकी नायिका राइया सिन्हा है। रायपुर के युवक का बॉलीवुड में
बतौर हीरो फिल्मों में दिखना छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है। ये फिल्म दो कपल की कहानी है जिसमे शंका के खिलाफ बहुए ही बढिय़ा सन्देश दिया गया है । लड़का लड़की जब एक जगह काम करते है तो मन में शंका पैदा होता है। गलतफहमी के कारण परिवार टूट जाता है इसी को लेकर यह फिल्म बेहतर सन्देश देती है। फिल्म के डायरेक्टर मंजूल कपूर का कहना है कि फिल्म में पूरन किरी ने अच्छा काम किया है। यह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है।

यही हाल रहा तो छालीवुड का कुछ नहीं होगा
पूरन किरी कहते हैं कि आज छत्तीसगढ़ी फिल्मों का जो हाल है उससे तो लगता है कि दस सालों कुछ नहीं होने वाला है। यहां लोग शौकिया तौर पर 2-3 लाख में फिल्म बना लेते हैं। फिल्मों को यहां के निर्माता निर्देशक मजाक बना लिए हैं। आपको फिल्मों में छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बताना पडेगा। कलाकारों को हर प्रकार की सुविधाएं देनी होगी। कहानी अच्छी हो , कास्ट अच्छे हो, तभी लोग आपकी फिल्म देखेंगे।


नक्सली इलाकों के सात बच्चों का जिम्मा लिया फि़ल्मी अदाकारा ने

बच्चों के बीच जाकर शिक्षा का अलख जगा रही है मोना सेन
अरुण बंछोर
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ी फिल्मों की सुपर स्टार मानी जाने वाली अदाकारा मोना सेन अब घोर नक्सली क्षेत्र में शिक्षा का अलख जगाने पहुँच गयी है। समाजसेवा का जूनून इस कदर है उनके मन में कि गरीब बच्चे देखते ही उनका दिल पिघल जाता है। कई बच्चों को गोद लेकर उनके रहन सहन और शिक्षा का खर्च उठा चुकी मोना अब धुर नक्सली क्षेत्र में यही समाजसेवा के लिए पंहुच चुकी है जहां नाजे से बड़े बड़े घबराते हैं। उनके जज्बे को सलाम करना ही होगा। क्योकि नक्सली क्षेत्रों में काम करना किसी खतरों से खेलने से भी कम नहीं है।
छत्तीसगढ़ी लोक कला मंच के माध्यम से समाजसेवा करने वाली मोना सेन ने हाल ही में नक्सली क्षेत्र आवापल्ली ,भोपालपट्टनम के सात बच्चों को गोद लेकर उनकी शिक्षा दीक्षा और लालन पालन का खर्च उठाने का जिम्मा अपने हाथों में लिया है। मोना सेन पहले भी ऐसा जज्बा दिखा चुकी है। वे कहती है अपनों के लिए तो सब जीते हैं उन गरीबों के लिए जीना चाहिए जिनको जरुरत है सहारे की। गीत संगीत से लोगों का मनोरंजन करना तो आम बात है पर किसी को जीने की राह बता दे, उन्हें पड़ा लिखाकर उनके पैरों पर खड़ा कर दें तो बहुत सुकून मिलता है खुद को जो खुशी मिलाती है उसे बयाँ नहीं की जा सकती।
मोना की तमन्ना है कि छत्तीसगढ़ के गरीब परिवारों और दूरस्थ अंचलों में शिक्षा का अलख जगाएं ताकि कोइ भी बच्चा अशिक्षित ना रहे। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कदम रखने पर वे कहती हैं कि बस्तर में भी स्कूलें है पर घने जंगलों और दूरस्थ इलाकों में शिक्षा काफी दूर है। गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को पढ़ा लिखाकर उनके पैरों पर खड़ा करना चाहती हूँ। कंप्यूटर शिक्षा में भी पारंगत करना चाहती हूँ। इसके लिए सारी व्यवस्था करूंगी।
जंगलों के बीच प्रतिभा ढूंढेगी मोना
समाजसेवी मोना सेन कहती है कि दूरस्थ आदिवासी अंचलों में बहुत सी ऐसी प्रतिभा है जिसे तराशने की जरुरत है। ऐसी प्रतिभा को ढूंढकर उन्हें तराशा जाएगा और हर संभव मदद भी दी जाएगी। मोना बताती है कि बस्तर के दूरस्थ अंचलों में गयी थी जहां जाने से बड़े बड़े । मोना पहली कलाकार है जो नक्सली गाँवों में पहुँची हैं। वहां बच्चों से मिली उन्हें पडऩे लिखने की प्रेरणा दी, बच्चों के चहरे पर कुछ कर गुजरने की ललक देखी। मोना बताती है कि बस्तर के कई गाँव ऐसे है जहां शिक्षा नहीं पहुँची है। ऐसी क्षेत्रों में जाउंगी और शिक्षा का प्रचार प्रसार करूंगी ,बच्चों को पढ़ाऊंगी, काबिल बनाउंगी और उनको उनके पैरों पर खड़ी करूंगी।

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

छत्तीसगढ़ में फ़िल्म सिटी बनाना चाहतें है सोहन लाल

बहुभाषाई फिल्म बनांकर देश भर में प्रदर्शित करेंगे
छालीवुड फिल्म निर्माता निर्देशक एवं एक्टर सोहन लाल वर्मा की दिली तमन्ना है कि वे छत्तीसगढ़ में कलाकारों के लिए फ़िल्म सिटी बनाएं। जिसमे यहां के कलाकारों को नियमित रूप से रोजगार मिल सके। उनका कहना है कि भविष्य में राष्ट्रिय व् अंतंराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बनाना चाहता हूँ। कैमरामेन से डायरेक्टर और कलाकार बने सोहन वर्मा से हमने हर मुद्दों पर बात की है।
0 आप कैमरामेन से डायरेकटर फिर निर्माता बने , क्यों?
मैं 2005 से जी के कैसेट कम्पनी बिलासपुर के लिए नियमित रूप से एल्बम जस एवं पंथी गीतों कीशूटिंग एडिटिंग व् निर्देशन करते आ रहा हूँ साथ ही दूजे निषाद के कई हास्य् नाटक का निर्देशन लेखन छायांकन व् संपादन किया हूँ।पिछले साल आई छत्तीसगढ़ी फ़िल्म  असली संगवारी में सह निर्देशन के आलावा सवाद लेखन स्क्रीन प्ले छायांकन व् सम्पादन कार्य किया है।
0 ऐसी कोइ तमन्ना जो आप पूरा होते हुए देखना चाहते हैं 
मेरी एक ही तमन्ना है की छत्तीसगढ़ के कलाकारों के लिए ऐसे स्वयं का फ़िल्म सिटी बना सकूँ । जिसमे यहां के कलाकारों को नियमित रूप से रोजगार मिल सके।भविष्य में राष्ट्रिय व् अंतंराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बनाना चाहता हूँ
0 कैसे और कहाँ से आपने एक्टिंग का सफर शुरू किया?
बचपन से ही हमारे ग्राम में रामलीला में अभिनय की सुरुवात किया।  2005 में जब मैं ख्याति प्राप्त लोक गायक पं शिवकुमार तिवारी के सम्पर्क में आया तो उन्होंने ही मुझे इस फिल्ड में आने की प्रेरणा दिया उनका फागुन गीत जिसे मेरे द्वारा बनाया गया है लोग आज भी बड़े चाव से देखते सुनते है।
0 फिल्मों में काम करते आपको कितना वक्त हो गया ?
वैसे मैं विगत 6 सालो से इस फिल्ड में जुड़ा हूँ लेकिन लोगो तक असली संगवारी फ़िल्म के बाद पहुचा।
0 अब तक की आपकी उपलब्धी क्या है?
स्वयं के साधन से छत्तीसगढ़ी फ़िल्म बनाकर पर्दे तक पहुचाना । यु ट्यूब चैनल एसएलवी इंटरटेनमेंट के माध्यम से विश्व के बीस देशों में मेरे एक लाख से ऊपर प्रतिमाह दर्शक है।जो मेरा उत्साह वर्धन करते रहते है
0 आप छस्तीसगढ़ी फिल्मों में अपना आदर्श किसे मानते है?
मैं बचपन से ही ममता चंद्राकर एवं प्रेम चंद्राकर तथा मिथिलेश साहू से प्रभावित हूँ।
0 क्या आप अपने कामों से संतुष्ट हैं? 
मैं अब तक अपने कार्य से संतुस्ट नही हूँ जब तक हमारी फिल्म सफल नही हो जाती संघर्ष करते रहेंगे।
0 आपको कभी निराशा हुई थी ? 
हाँ छत्तीसगढ़ी फिल्मो के सिमित बाजार के करन निराशा होती है। मगर फिर भी भविष्य में बाजार बूम होने की आशा है
0 भविष्य की क्या योजना है ?
आने वाले दिनों में मल्टी लेंग्वेज फिल्म बनाने जा रहा हूँ। ताकि उनका प्रदर्शन पुरे भारत वर्ष में किया जा सके।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

छालीवुड पर एकछत्र राज करना चाहती है एलीना

 रियल लाइफ में पापा की लाडली बेटी बन कर घर सम्हालती है 
- अरुण बंछोर
छालीवुड की चर्चित अभिनेत्री एलीना डेविड मसीह आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनकी कला और अभिनय के सब कायल हैं। एलीना ने आने वाली फिल्म ऑटो वाले भाटो में गजब का अभिनय किया है।
निर्माता क्षमानिधि मिश्रा भी उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते हैं। एलीना की तमन्ना नंबर वन अभिनेत्री बनकर छालीवुड में राज करने की है। वे कहती है कि गाँवों में फिल्म देखने की व्यवस्था हो तभी छत्तीसगढ़ी फिल्मे चलेंगी। पहले एलीना हैदराबाद में रामूजी फिल्म सीटी में कोरियोग्राफर थी और बाद में छत्तीसगढ़ी फिल्मो में कदम रखी। रियल लाइफ में एलीना अपने पापा की लाडली बेटी बन कर घर सम्हालती है । कई फिल्मो में अपनी अभिनय का लोहा मनवाने वाली एलीना से हमने हर पहलूओं पर बेबाक बात की है। पेश  हुई बातचीत के संपादित अंश।
आपको एक्टिंग का शौक कब से है ?
मुझे एक्टिंग करने का शौक बचपन से ही रहा है जब भी मैं कोई फिल्म या सीरियल देखती थी तो उस जगह अपने आप को रखकर सोचती थी ।
मौका कैसे मिला और आपके प्रेरणाश्रोत कौन है ?
फिल्म लाइन में आने से पैहले मै हैदराबाद में रामूजी फिल्म सीटी में कोरियोग्राफर थी लेकिन यहां आकर एक्टिंग करने लगी । मेरे आदर्श मेरे पिता जी ही है। और छत्तीसगढ़ के सभी बड़े कलाकारों ने एक के बाद एक मुझे फिल्म एल्बम और टेली फिल्म के लिए सहयोग किये।
अभिनय की ओर आपका रुझान कैसे हुआ ?
हैदराबाद फिल्म सीटी में टॉलीवुड और बॉलीवुड की शूटिंग देख कर अभिनय की ओर मेरा रुझान हूआ।
कोई ऐसा अवसर आया हो ,जब आप बहुत उत्साहित हुई हो?
जी जब मैंने अपनी पेहली फिल्म छलिया की तो बहुत ही रोमांचित हुई और मेरा मनोबल उत्साह काफी बढ़ गया।
आप फिल्मो में अभिनेत्री की भूमिका निभाती है, तो आपको कैसा महसूस होता है?
जब मैं कोई अभिनेत्री का भूमिका निभाती हूँ तो मुझे गर्व महसूस होता हैं की मैं अपने रोल को बखूबी से कर पा रही हूँ।
रील लाइफ और रीयल लाइफ में क्या अंतर है?
दोनों अलग अलग चीज है रियल लाइफ को रील लाइफ में नहीं जोड़ सकती । रील लाइफ में मैं एक प्रोफेशनल भूमिका निभाती हूँ और रियल लाइफ में अपने पापा की लाडली बेटी बन कर घर सम्हालती हूँ और दोनो ही चीज में मेरे बड़े और फ्रैंडस साथ देते है।
ऐसा कोई क्षण जब निराशा मिली हो?
जब छतीसगढ़ फिल्म इन्डस्ट्री एसोसियशन सम्मान समारोह हूआ था।और मुझे भी बेस्ट अभिनेत्री से सम्मानित किया गया था और मैं वहा नहीं जा पाई थी तब मुझे बहुत निराश हुई थी।
छत्तीसगढ़ी फिल्मे थियेटरों में ज्यादा दिन नही चल पाती ,आप क्या कारण मानती है ?
छतीसगढ़ी फिल्में इस कारण थियेटर में ज्यादा दिन नहीं चल पाती क्योंकि आज के बच्चे और नोजवान छतीसगढ़ी नहीं समझ पाते और बॉलिवुड फिल्म को ज्यादा महत्व देते हैं । दूसरी तरफ जो गाँव के लोग है वो छतीसगढ़ी फिल्म को बड़े ही चाव से देखते है और महत्व भी देते है अगर हमारे आस पास के गाँव कस्बो में थियेटर की व्यवसथा कराई जाए तो छतीसगढ़ी फिल्म चलेगी भी और आगे भी बढेगी।
आपका कोई सपना है जो आप पूरा होते देखना चाहती हैं?
मेरा सपना है छालीवुड में एकछत्र राज करने की है और मैं अपने इस सपने को पूरा होते देखना चाहती हूँ।
छत्तीसगढ़ी फिल्मे ज्यादा व्यवसाय क्यों नहीं कर पाती। कारण क्या मानते?
छतीसगढ़ी फिल्मेँ ज्यादा व्यवसाय इसलिए नहीं कर पाती क्योंकि उन्हें अलग - अलग क्षेत्र में सेंटर नहीं मिल पाता।छोटे छोटे कस्बों में भी थियेटरों की व्यवस्था हो । 

कविता लिखना चुनौती नहीं एक साधना हैं

 मेरे गीत, गज़़लें कविता लोगों की पसंद बने यह आरजू है: नैनी 
एक मुलाक़ात - अरुण बंछोर 
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किसी एक इंसान में बहुत सारे गुण हो ऐसे बिरले लोग ही मिलते हैं। जी हाँ यही गुण है नंदिनी तिवारी नैनी में। वे एक शिक्षिका होने के साथ साथ कवयित्री, लेखिका, एक्ट्रेस, एंकर और डांस कोरियोग्राफर भी है। वे कहती हैं कि कविता लिखना चुनौती नहीं एक साधना हैं। मेरे गीत, गज़़लें कविता लोगों की पसंद बने यही आरजू है। नंदिनी को शहर की संस्था  सद्भावना साहित्य संस्थान ने सम्मानित किया है। दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल ने उनसे हर पहलूओं पर बेबाक बात की है । प्रस्तुत है बातचीत के सम्पादित अंश।
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संक्षिप्त परिचय 
नाम   - नंदिनी तिवारी नैनी
शिक्षा    एम•ए(हिन्दी), बी•एड•,पीएचडी(हिंदी)
व्यवसाय   - शिक्षिका, कवयित्री, लेखिका, ऐक्ट्रेस, एंकर
रुचि  - सिंगिंग, डांसिंग, रीडिंग लिट्रेचर बुक
उपलब्धि  -  सद्भावना साहित्य संस्थान द्वारा सम्मानित
                     डायट ओडिशा द्वारा सम्मानित
हिंदी विषय पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय सेमीनार में व्याख्यान ।
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कविता लिखने की ओर रुझान कैसे हुआ?
मेरा जन्म साहित्यकार परिवार में हुआ। जो लेखन के लिए प्रेरक रही एवं आसपास के कुदरती वातावरण मेरे भीतर कविता का सृजन करते हैं ।
मतलब पारिवारिक माहौल ने ही आपको लिखना सिखाया?
हां। पारिवारिक माहौल के साथ मेरी भावनाओं ने मेरी गीत-गज़़लों को अल्फ़ाज़ दिए ।
घर परिवार और नौकरी के बीच कविता लिखने के लिए समय कैसे निकाल पाती हैं?
कविता लिखने अलग से समय नहीं निकालती। दैनिक कर्तव्यों का निर्वहन करते रहने के दौरान जो अहसास होता है वह उसी पल मेरी कविता बन जाया करती है ।
कभी-कभी आपको आलोचना भी सहनी पड़ती होगी ?
अभी तक तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ । वैसे मुझे इंतजार है कि मेरी रचनाओं की भी आलोचना हो । क्योंकि आलोचना से ही साहित्य में निखार आता है ।
कविता लिखना कितनी बड़ी चुनौती है?
चुनौती कैसी ? मैं किसी की अपेक्षापूर्ति के लिये कविता नहीं लिखती । जो भी लिखती हूं वो मेरे अपने जज्बात हैं । कविता लिखना चुनौती नहीं एक साधना हैं।जो स्वयंभू है।निरंतर होने वाली आस पास की घटनाओं द्वारा कविता को वातावरण मिलता है।जिसकी गहराई में जाने पर हमारे विचार कविता का रूप ले लेती है।
 इस क्षेत्र  में कभी निराशा हुई है ?
नहीं । अब तक तो नहीं
और कभी ऐसा क्षण हो आया हो जब आप बहुत ज्यादा उत्साहित हुई हो?
हां । मेरी रचनाधर्मिता के चलते मेरे फेवरेट कवि से ऑनलाईन मुलाकात होना और उनकी तारीफ पाना मुझे उत्साहित कर गया । और आगामी तारीख में मुझे उनके साथ हम शरीयत होने का भी मौका मिलेगा । यह मेरे लिये बेहद रोमांचक रहेगा ।
आपको इसके लिए परिवार से कितना सहयोग मिलता है?
भरपूर सहयोग है परिवार का । मेरे परिवार को मुझ पर पूरा भरोसा है । मै इतनी दूर यहां जॉब कर रही हूं मंचों पर कविता कह पा रही हूं ये मेरे परिवार का ही सहयोग है।
ऐसा आपका कोई सपना जो आप पूरा होते हुए देखना चाहती हों?
मैं एक स्थापित कवियत्री के रुप में स्थान बनाना चाहती हूं । मेरे गीत मेरी गज़़लें कविता पसंद लोगों की पसंद बने यह आरजू है

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

फिल्म ही मेरी जिंदगी है : सलीम अंसारी

  हर भूमिका मुझे पसंद है  
 छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर कलाकार सलीम अंसारी छालीवुड की शान है। ऐसा कोई नहीं है जो उन्हें अपना
आदर्श नहीं मानता हो। दर्शकों को वे रुलाना जानते हैं तो हंसाना भी बखूबी जानते है। कॉमेडी से लेकर विलेन तक की भूमिका निभा चुके सलीम अंसारी अपने रोल से सभी को संतुष्ट करते हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्मो के अलावा सलीम जी भोजपूरी और हिन्दी फिल्मे भी कर चुके हैं। भोजपुरी फिल्म तहलका हमरे नाव की शूटिंग के दौरान समय निकालकर सन स्टार के दफ्तर आये तो हमने उनसे हर पहलूओं पर बेबाक बात की।
छत्तीसगढ़ी फिल्मो की क्या संभावनाएं हैं?
जब तक टेक्नीकल क्षेत्र में एक्सपर्ट लोग नहीं होंगे तब तक ऐसी ही कमजोर फिल्मे बनती रहेंगी। यहां जिसे जो नहीं आता वही करते हैं । गायक निर्देशक बन जाता है। कोई भी फाइट मास्टर बन जाता है। आप अंदाज लगा ले कैसी फिल्मे बनेंगी। छालीवुड की संभावनाएं अच्छी है पर फिल्मे अच्छी नहीं बन रही है।
छत्तीसगढ़ी सिनेमा अच्छा व्यवसाय करे इसके लिए क्या कर सकते हैं?
यहां फिल्मे कमजोर बन रही है । फिल्मे नहीं चल पाती इसकी वजह भी हैं और वो सब जानते हैं कि पिछड़े हुए राज्य में टॉकीजों का विकास नहीं होना। प्रमोशन और प्रचार प्रसार जब तक नहीं होगी फिल्मो का चलना मुश्किल है। छत्तीसगढ़ में मिनी टॉकिजों की बड़ी आवश्यकता है जहां छत्तीगसढ़ी फिल्मों के दर्शक आसानी से पहुंच सके। प्रचार प्रसार की कमी है।
 आप इस क्षेत्र में कैसे आये ?
मै थियेटर से आया हूँ। बहुत साल तक थियेटर किया फिर एल्बम में काम किया। मेरे एल्बमों की कोई गिनती नहीं है। उसके बाद फिल्मे करने लगा। लोगो को मेरा काम पसंद आया ,ये मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है।
फिल्मो की और रुझान कैसे हुआ?
बस टीवी देखकर और थियेटर करते करते फिल्मो की ओर रुझान हुआ।
आपने बहुत सी फिल्मे कर ली आपकी राह कैसे आसान हुआ?
मुझे हर प्रकार का रोल पसंद है मुझे जो रोल दिया जाता है मै सहर्ष स्वीकार कर लेता हूँ और उसमे डूबकर काम करता हूँ। इसलिए मेरा राह आसान हुआ।
 छत्तीसगढ़ी फिल्मो के प्रदर्शन में कमी कहाँ होती है?
प्रचार प्रसार और विज्ञापन में कमी फिल्म नहीं चलने का सबसे बड़ा कारण है। थियेटर भी एक कारण हो सकता है। गाँव गाँव तक हम अपनी फिल्म नहीं पंहुचा पा रहे हैं। बेहतर प्रचार पसार हो और प्रदेश के सभी टाकीजों में फिल्म लग जाए तो लागत एक हप्ते में निकल आएगी। सरकार मदद नहीं करती और डिस्ट्रीब्यूशन भी सही नहीं है।
क्या छत्तीसगढ़ में नायिकाओं की कमी है कि बाहर से लाना पड़ता है?
हाँ जरूर है। लडकिया बहुत है पर अच्छे घरों की लडकियां इस फिल्ड में आना नहीं चाहती क्योकि उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता जो वो चाहतीं हैं। इसलिए कमी बनी हुई है।
आपकी भविष्य की क्या योजना है?
मैं लगातार फिल्मे करता रहूंगा। यही मेरी जिंदगी है। फिल्म मैं पैसों के लिए नहीं करता बल्कि ये मेरे जीवन का अहम हिस्सा है।
 ऐसा कोई सपना जिसे आप पूरा होते हुए देखना चाहते हैं?
गॉडफादर जैसे रोल करने की तमन्ना है, जो किसी के जीवन पर आधारित हो। य "जिला गंजबासौदा मध्यप्रदेश"